" आलम "
एक सोच अकल से फिसल गई
मुझे याद थी या बदल गई
मेरी सोच थी या वो ख्वाब था
मेरी जिंदगी का हिसाब था
मेरी ज़ुस्तज़ु की बरक्स थी
मेरी मुश्किलो का वो अक्ष थी
मुझे याद हो तो वो सोच थी
जो ना याद हो तो ग़ुमाँन था
मुझे बेठे बेठे ग़ुमाँन हुवा
गुमाँ नही था ख़ुदा था वो
मेरी सोच नही थी खुदा था वो
वो खुदा की जिसने जुबान दी मुझे दिल दिया मुझे जान दी
वो जुबान जिसे ना चला सके वो दिल जिसे ना मना सके जो जां'जिसे ना लगा सके
कभी मिल तो तुझको बताए हम
तुजे इस तराह से सताए हम
तेरा इश्क़ तुजसे छीनकर तुजे महफ़िल आके रुलाए हम
तुजे दर्द दू तू ना सेह सके
तुजे दू मकाँ तू ना रेह सके
तुजे मुश्किलो में गेरा के में कोई ऐसा रस्ता निकाल दू तेरे दर्द की में दवा बनु
तुजे हर नजर पे उबोल् दू तुजे जिंदगी का शॉळ दू
कभी मिल भी जायेंगे गम न कर
हम गिर भी जायेंगे गम न कर
तेरे एक होने में शक नही मेरी नियतो को तू साफ़ कर
तेरी शान में भी कमी नही फ़िर इस कलाम🖌 को माफ़ कर ।

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