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Friday, 2 October 2020

बेज़ुबाँ अल्फ़ाज



कभी रुक गये कभी चल दिये 

कभी चलते चलते भटक गये

यूँही उम्र साडी गुजार दी 

यूँही जिंदगी के सितम सहे

कभी नींद में कभी होंश में 

तू जहां मिला तुजे देखकर 

ना नजर मिली , ना जुबाँ हिली 

यूँही सर झुका कर गुजर गये

मुझे याद हे कभी एक थे..

मगर आज हम हे जुदा जुदा

वो जुदा हुये तो संवर गये 

हम जुदा हुये तो बिखर गये 

कभी अर्श पर कभी फर्श पर

कभी उनके दर कभी दर बदर

ग़म-ए-आश्कि तेरा शुक्रिया

हम कहा कहा से गुज़र गये ..


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