' तू आ... '
रंजिस ही सही दिल की
दुखाने के लिए आ
कुछ तो मेरे पिंदार-ए-मोहब्बत
का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को
मनाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही
फिर भी कभीं तो
रस्म-ओ-रह-दुनिया ही
निभाने के लिए आ
किस किस को बताएंगे
जुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा हे तो
जमाने के लिए आ
इक उम्र से हूँ
लज्जत-ए-गिर्या से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को
रुलाने के लिए आ
अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम
को तुझसे हें उम्मीदें
ये आखरी शमएँ भी
बुझाने के लिए आ।

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